Description
किताब के बारे में
इस पुस्तक में सावित्राीबाई की जीवनी संघर्ष एवं साहित्यिक योगदान का विस्तृत वर्णन किया गया है। सावित्राीबाई फुले को भारत में नारीवादी आंदोलन की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। पुणे में, भिड़ेवाड़ा के पास, सावित्राीबाई फुले और ज्योतिबा ने 1848 में पहले आधुनिक भारतीय लड़कियों के स्कूलों में से एक शुरू किया। सावित्राीबाई फुले ने लोगों के लिंग और जाति के आधार पर पूर्वाग्रह और अन्यायपूर्ण व्यवहार को खत्म करने के लिए संघर्ष किया। उनकी मानवतावाद किसी संकीर्ण विचारधारा पर आधारित नहीं था, बल्कि वह समग्र और व्यावहारिक था। उनके लिए मानवता का अर्थ थाµ सभी मनुष्यों को जाति, लिंग, धर्म, वर्ग आदि के भेद से ऊपर उठकर एक समान अधिकार और सम्मान देना। उन्होंने अपने लेखों और कविताओं में बाल विवाह जैसी प्रथाओं की आलोचना की और लड़कियों को शिक्षा, आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान के लिए प्रेरित किया। सावित्राीबाई फुले का कार्य भारत में नारी मुक्ति आंदोलन की नींव माना जाता है।
इस पुस्तक में सावित्राीबाई द्वारा दिये गये योगदानों को लेखक ने उल्लेख किया है कि कैसे एक निचली जाति मे महिला जन्मी अपने अनुभवों से एक स्वतंत्रा नारी दृष्टिकोण विकसित किया। आशा है यह पुस्तक पाठको के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।
लेखक के बारे में
भूपेन चैधरी एक युवा और ऊर्जावान शोधार्थी और समाजशास्त्रा के शिक्षक हैं। उन्होंने समाजशास्त्रा में एम.ए. किया है और भागलपुर के टीएमबीयू में ”बिहार में सामाजिक आंदोलन और कृषि परिवर्तन (1947-1990)“ पर शोध कर रहे हैं। उन्होंने कई संगोष्ठियों और सम्मेलनों में भाग लिया है और राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रिकाओं में कई शोध पत्रा प्रकाशित किए हैं। चैधरी के पहले लगभग दस किताब प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में, वे जे.आर.एस. काॅलेज, जमालपुर में अध्यापन कार्य कर रहे हैं।











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